सावधान! हर साल 52 हजार माइक्रोप्लास्टिक कण शरीर में कर रहे हैं प्रवेश

पैरिस। हर साल भोजन और सांस के जरिए हजारों माइक्रोप्लास्टिक कण मानव शरीर के अंदर प्रवेश कर जाते हैं। एक सर्वे में यह चैंकाने व डराने वाली बात निकलकर सामने आई है। बता दें कि माइक्रोप्लास्टिक, प्लास्टिक के महीन कण होते हैं, जो मानव निर्मित उत्पादों जैसे सिंथेटिक कपड़ों, टायर और कॉन्टैक्ट लेंस आदि से टूटकर बनते हैं। माइक्रोप्लास्टिक पृथ्वी पर हर जगह मिलने वाली सामग्रियों में से एक है। वे दुनिया के सबसे ऊंचे कुछ ग्लेशियरों और सबसे गहरी समुद्री खाइयों की सतह पर भी पाए जाते हैं। पिछले कई अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि कैसे माइक्रोप्लास्टिक मानव की खाद्य श्रृंखला में शामिल हो सकता है। पिछले साल सामने आए एक अध्ययन के अनुसार लगभग सभी प्रमुख बोतलबंद पानी ब्रांडों के नमूनों में भी माइक्रोप्लास्टिक पाया गया था। कनाडा के वैज्ञानिकों ने माइक्रोप्लास्टिक contamination पर सैकड़ों आंकड़ों का विश्लेषण किया और उनकी तुलना अमेरिकी लोगों के आहार और उपभोग की आदतों से की। उन्होंने पाया कि हर साल एक वयस्क पुरुष 52 हजार माइक्रोप्लास्टिक कणों को निगल सकता है। जिस प्रदूषित वातावरण में हम सांस लेते हैं अगर उसे भी इसमें शामिल कर लिया जाए तो यह आंकड़ा बढ़कर 1 लाख 21 हजार कणों तक पहुंच जाएगा, जो हर दिन 320 प्लास्टिक पार्टिकल्स के बराबर है। इन्वायरनमेंटल साइंस एंड टेक्नोलाॅजी नाम के जर्नल में प्रकाशित इस स्टडी के नतीजे बताते हैं कि अगर कोई व्यक्ति सिर्फ बॉटल वाला पानी ही पिए तो उसके शरीर में हर साल अतिरिक्त 90 हजार माइक्रोप्लास्टिक के कण पहुंचने लगेंगे। स्टडी के ऑथर ने बताया कि उनके आंकड़े सिर्फ एक अनुमान है। कोई व्यक्ति कितने प्लास्टिक का सेवन करता है यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि वह कहां रहता है और क्या खाता है। इन माइक्रोप्लास्टिक के कणों का इंसान के शरीर और सेहत पर क्या असर पड़ता है इस बारे में भी अभी कोई निश्चित जानकारी सामने नहीं आयी है। लेकिन इतना जरूर है कि 130 माइक्रोमीटर से छोटे माइक्रोप्लास्टिक के कण इंसान के टिशू में जाकर इम्यूनिटी को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। हालांकि अभी इस बात के पुख्ता सबूत नहीं मिले हैं कि स्टडी में जिन माइक्रोप्लास्टिक के कणों की बात की जा रही है वे इंसान की सेहत के लिए कितने खतरनाक हैं। हमारी लाइफ में हर जगह प्लास्टिक की घुसपैठ है। सिर्फ किचन की बात करें तो नमक, घी, तेल, आटा, चीनी, ब्रेड, बटर, जैम, सॉस… सब कुछ प्लास्टिक में पैक होता है। तमाम चीजों को लोग किचन में रखते भी प्लास्टिक के कंटेनरों में ही हैं। सस्ती, हल्की, लाने-ले जाने में आसान होने की वजह से लोग प्लास्टिक कंटेनर्स को पसंद करते हैं। ऐसे में खाने-पीने से जुड़ी चीजों में यूज होने वाले प्लास्टिक से होने वाले नुकसान के बारे में जानना बहुत जरूरी है। इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टॉक्सिकॉलजी रिसर्च, लखनऊ के एक साइंटिस्ट के अनुसार पानी में न घुल पाने और बायोकेमिकली ऐक्टिव न होने की वजह से प्योर प्लास्टिक बेहद कम जहरीला होता है। लेकिन जब इसमें दूसरी तरह के प्लास्टिक और कलर आदि मिला दिए जाते हैं तो यह नुकसानदेह साबित हो सकते हैं। ये कैमिकल खिलौने या दूसरे प्रॉड्क्ट्स में से गर्मी के कारण पिघलकर बाहर आ सकते हैं। इस खतरे को ध्यान में रखते हुए अमेरिका ने बच्चों के खिलौनों और चाइल्ड केयर प्रॉडक्ट्स में इस तरह की प्लास्टिक के इस्तेमाल को सीमित कर दिया है। यूरोप ने साल 2005 में ही इस पर बैन लगा दिया था तो जापान समेत 9 दूसरे देशों ने भी इस पर पाबंदी लगा दी है। प्लास्टिक की थालियां और स्टोरेज कंटेनर्स खाने-पीने की चीजों में कैमिकल छोड़ते हैं। इसका खतरा टाइप 3 और 7 या किसी हार्ड प्लास्टिक से बने कंटेनर्स में और भी ज्यादा होता है। इन प्लास्टिक्स में बायस्फेनॉल ए नामक कैमिकल होता है। ये कैमिकल हमारे शरीर के हॉर्मोंस को प्रभावित करते हैं, इनसे ब्रेस्ट कैंसर का खतरा रहता है और पुरुषों में स्पर्म काउंट घटने का भी रिस्क होता है। प्रेग्नेंट महिलाओं और बच्चों के लिए ये ज्यादा नुकसानदेह है। अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने इस बात को माना है कि सभी तरह की प्लास्टिक एक वक्त के बाद कैमिकल छोड़ने लगते हैं, खासकर जिन्हें गर्म किया जाता है। आप ऐसे समझ सकते हैं कि बार-बार गर्म करने से इन कंटेनर्स के प्लास्टिक के कैमिकल्स टूटने शुरू हो जाते हैं और फिर ये खाने-पीने की चीजों में मिक्स हो जाते हैं। नतीजन गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। आमतौर पर हम प्लास्टिक बोतल को तेज धूप में खड़ी कार में रखकर छोड़ देते हैं। गर्म होकर इन प्लास्टिक बोतलों से कैमिकल निकलकर पानी के साथ रिऐक्ट कर सकता है। ऐसे पानी या सॉफ्ट ड्रिंक्स को न पिएं। यहां तक कि घरों की छतों पर मौजूद पानी की टंकियों में तेज धूप में होने वाले रिएक्शन को लेकर भी खतरा जताया जा रहा है। इसे लेकर स्टडी की जा रही है लेकिन अभी पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। सावधानी के तौर पर टंकी के ऊपर शेड बनवा सकते हैं। अक्सर देखा गया है कि छोटी पॉलिथीन थैलियों में लोग गर्म चाय ले जाते हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक यह तरीका बेहद नुकसानदेह है। तुरंत तो कुछ पता नहीं चलता, लेकिन लंबे समय तक इस्तेमाल करने से यह कैंसर का कारण बन सकता है। दरअसल, बेहद गर्म चीजों के साथ प्लास्टिक का रिएक्शन होता है तो कैंसर कारक तत्व पैदा होते हैं। इसी तरह खाने की दूसरी चीजों को भी गर्म-गर्म प्लास्टिक कंटेनर में न रखें। प्लास्टिक शीशी में होम्योपैथिक दवाएं सेफ होती हैं, बशर्ते शीशी लूज प्लास्टिक की न बनी हों। वैसे, कांच की शीशी में होम्योपैथिक मेडिसिंस रखी हों तो बेहतर रहेगा, क्योंकि इसमें किसी भी तरह का शक-शुभा नहीं रह जाता। यह नियम एलोपैथिक दवाओं खासकर सिरप आदि पर भी लागू होता है। प्लास्टिक से बने इंजेक्शन, आईवी आदि के नुकसान के बारे में अभी कोई रिपोर्ट सामने नहीं आई है। बच्चे को फीड करने के लिए प्लास्टिक बॉटल का इस्तेमाल न करें। इसकी जगह स्टील या कांच की बॉटल यूज करें। अगर प्लास्टिक की बॉटल यूज करना ही है तो अच्छी क्वॉलिटी की लें। प्लास्टिक बॉटल को माइक्रोवेव या गैस पर पानी में बिल्कुल न उबालें। बॉटल को गर्म पानी से साफ करना काफी है। इसके अलावा क्लोरीन सलूशन से साफ कर सकते हैं। इससे सारे कीटाणु निकल जाते हैं। साभार

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